सदा नीरा’ जल गंगा संवर्धन कार्यक्रम

सदा नीरा’ जल गंगा संवर्धन कार्यक्रम
स्थान, भारत भवन, भोपाल
27 मई 2026 को भोपाल में ‘सदा नीरा’ जल गंगा संवर्धन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें जलपुरुष राजेन्द्र सिंह जी मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए। जलपुरुष राजेन्द्र सिंह जी ने पंचमहाभूतों को भारतीय ज्ञान तंत्र से कैसे समृद्ध बनाकर रख सकते हैं, इस विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि हमारे शास्त्रों में प्रकृति के प्रति भगवान जैसा व्यवहार करने का आदेश है। ‘‘यो नो द्वेषत् पृथिवि यः पृतन्याद् भिदासान्मनसा यो वधेनतं नो भूमे रन्धय पूर्वकृत्वरि’’ {अथर्ववेदरू कां. १२, सू. १, मं. १४} भारत का प्राचीन संविधान, जिन्हें हम वेद कहते हैं, उसमें यह बात बहुत स्पष्टता से कही गई है कि जो पृथ्वी को कष्ट देता है, उसका पृथ्वी को बद्ध कर देना चाहिए और जो पृथ्वी को सताता है, उसको पृथ्वी को दण्ड देना चाहिए। ऐसी प्रार्थना भारत का समाज अपने भगवान से कर सकता है और भगवान तो पंचमहाभूत होते हैं।
पंचमहाभूतों से निर्मित प्रकृति ही परमात्मा है। भारतीय विज्ञान और अध्यात्म दोनों ने उक्त ‘सत्य’ को सिद्ध किया था। इस सत्य को जब तक हमने अपने व्यवहार और संस्कार से जीवन जिया था, तभी तक हमारे पास केवल कुछ लिखने के लिए ही नहीं, बल्कि सीखने और दुनिया को सिखाने लायक ज्ञान भी था। उस कालखण्ड में भारत सिखाने वाली भूमि था, इसीलिए हमने स्वयं को विश्वगुरु मान लिया था। हम थे भी, पर आज नहीं रहे हैं, क्योंकि अब हम भी दुनिया की नकल करने में रुचि रखते हैं।
यहाँ संस्कृति और प्रकृति के योग से ही क्रान्ति, परिवर्तन और विकास की प्रक्रिया चली थी। उसमें भारतीय मानव अपने आप को प्रकृति का अंग मानकर जटिलताओं से मुक्त जीवन का व्यवहार करता था। इसी आवर्तन और परावर्तन को जानकर हमने सम्पूर्ण कालखण्ड को चार भागों में बाँटा था।
सत्ययुग में इंसान भी प्रकृति के अन्य अंगों के समान जटिलता-मुक्त, सादगी, सहजता और सरलता के साथ अहिंसक व्यवहार करके जीवन जीता था। उस काल में लोभ, लालच, क्रोध, मोह और महत्वाकांक्षा से मुक्ति थी। तब किसी के भी मन में विद्वान या राजा बनने का भाव नहीं आता था।
त्रेतायुग में विद्वान या राजा बनने का भाव आने लगा। प्रकृति के चार पाँवों में से एक पाँव टूटा, तीन पाँव बचे तो ‘त्रेता’ कहलाया। कुछ लोग विद्वान, ज्ञानदेव बनने लगे और कुछ लोग राजा बने। लेकिन तब भी वे मोह, माया आदि से मुक्त थे। इसलिए विद्वान और राजा भी प्रकृति के साथ जुड़े रहे। जैसेकृराजा जनक की घटना, अकाल मुक्ति हेतु अपनी रानी के साथ मिलकर हल चलाना आदि।
द्वापरयुग में मथुरा का राजा कंस आसपास के क्षेत्रों को लूटने लगा था। राजा और विद्वानों में धोखेबाजी और कलाबाजियों ने जन्म ले लिया था। प्रकृति के दो पैर टूट गए, इसलिए द्वापरयुग कहलायाय लेकिन इस काल में भी श्रीकृष्ण जैसा इंसान गोवर्द्धन पर्वत का सहारा लेकर लोगों को बाढ़ से बचा लेता है। वह अतिवृष्टि के कारण आई बाढ़ से बचाने के लिए गायों सहित सब ग्वालों को लेकर गोवर्द्धन पर्वत पर चला जाता है, जिससे ग्वाल और गायें बाढ़ के प्रकोप से बच जाते हैं। उस काल में भी प्राकृतिक आपदा का समाधान प्रकृति में ही खोजा जाता था। पहाड़ आपदा में सहारा हैं। यही जलवायु के मददगार बनते हैं। द्वापर में कंस भी जब तक सोना निकालने हेतु पहाड़ों को नहीं काट रहा था, तब तक प्रकृति के लुटेरों ने भी इसे ही जीवन का सहारा माना था।

कलियुग आज का युग है, जिसमें आपदा का समाधान भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता में ही खोजा जाने लगा है। यह हमें प्रकृति और परमात्मा दोनों से ही दूर कर रहा है। प्रकृति से दूर होने के कारण अब प्रकृति के तीन पैर टूट चुके हैं। अब प्रकृति का नहीं, बल्कि कलाओं और कल (मशीन) का युग है। इसीलिए इसे कलियुग कहते हैं।
पर इस कलियुग में भी अभी कुछ सम्भावनाएँ शेष हैं। इसलिए हम अपने मूल ज्ञान की तरफ लौटें और प्रकृति व संस्कृति के योग वाले भू-सांस्कृतिक मानचित्र के अनुरूप क्रान्ति, परिवर्तन और विकास की रूपरेखा तैयार करके अपने आज के विकास को सनातन विकास हेतु कार्य-योजना बनाकर काम करने की तैयारी करें। जिसमें सृष्टि के निर्माता पंचमहाभूत- भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर यही मेरे भगवान हैं। नीर अर्थात ‘जल’, जिसे हम ‘ब्रह्म’ भी मानते हैं, वही ब्रह्माण्ड का सृजन करने वाला है। उसको केन्द्र में रखकर पुनः विस्थापन, बिगाड़ और विनाश-मुक्त विकास की योजना बनाकर सनातन विकास का रास्ता पकड़ें।
कलियुग में भी जटिलताओं से मुक्त होकर सहज, सरल और सादगीपूर्ण जीवन से समता और आनंद का भाव सबके जीवन में प्राप्त होगा। यही सनातन विकास सतयुग की तरफ ले जाएगा। पंचमहाभूत ही भगवान हैं। यही परमात्मा, नारायण और सब कुछ हैं। इसी के साथ हम अपने शरीर और आत्मा को जोड़कर देखें और जियें, तो कलियुग भी सतयुग बन जाएगा। वही हमारा जीवन आज भी जटिलता-मुक्त बना देगा। हमारा ‘कृत’ प्रकृतिमय बनकर सतयुग पुनः स्थापित कर सकता है। बस! प्रकृति को परमात्मा और ‘सत्य’ मानकर अहिंसामय जीवन जीना शुरू करें।
इस कार्यक्रम के बाद प्रेस से वार्ता की और वीर भारत पाॅडकास्ट ज्वाइन किया।
इस कार्यक्रम में विक्रंता सिंह तोमर, डाॅ इश्वरचन्द्र , श्री प्रकाश चैहान निदेशक इसरो हैदराबाद, डाॅ विनिता सहाय, पारस प्रताप सिंह आदि उपस्थित रहे।





