सिंहानिया विश्वविद्यालय में डॉ. राजेंद्र सिंह ने जल संचय जन अभियान का शुभारंभ किया’

सिंहानिया विश्वविद्यालय में डॉ. राजेंद्र सिंह ने जल संचय जन अभियान का शुभारंभ किया’
भारत के जलपुरुष और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता डॉ. राजेंद्र सिंह ने 7 अगस्त 2026 को सिंहानिया विश्वविद्यालय परिसर से ‘जल संचय जन अभियान’ की शुरुआत की। कार्यक्रम में 400 से अधिक लोग मौजूद थे। अभियान की शुरुआत एक श्जोहड़श् स्थल पर तालाब पूजन, स्कूली बच्चों द्वारा 300 से ज्यादा पौधे लगाने और जल संरक्षण पर संवाद के साथ हुई।
डॉ. राजेंद्र सिंह जी ने कहा कि सिर्फ किताबी ज्ञान काफी नहीं है, छात्रों को जमीन पर काम करना भी सिखाना होगा। उन्होंने जल संरक्षण अभियानों, चेक डैम निर्माण, नदी पुनर्जीवन, अरावली संरक्षण और पारंपरिक जल संरचनाओं की रक्षा के अपने अनुभव साझा किए।
उन्होंने बताया कि जनभागीदारी से जल संरक्षण कैसे संभव है, खारे पानी को पीने योग्य कैसे बनाया जा सकता है और जल स्रोतों को कैसे बचाया जा सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विकास का मॉडल प्रकृति और संस्कृति के बीच संतुलन बनाए रखे। शैक्षणिक संस्थानों को ज्ञान, हरियाली और पानी इन तीनों को जोड़कर काम करना चाहिए। साथ ही उन्होंने शेखावाटी क्षेत्र के लोगों से जल संरक्षण के लिए मिलकर काम करने का आह्वान किया।
जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि यह विश्वविद्यालय ऐसी खास जगह पर है, जहां एक तरफ अरावली पर्वत माला है और दूसरी तरफ डेजर्ट यानी रेगिस्तान है। जहां अरावली पर्वत माला है, वहां मीठा पानी है और जहां अरावली पर्वत माला नहीं है, केवल रेतीली जमीन है, वहां सोर्स का पानी खारा और कड़वा है, जो पीने के लायक भी नहीं है।
अरावली पर्वत पानी को शुद्ध करके अपने अंदर संजोए रखता है। यह बहुत बड़े जलग्रहण क्षेत्र के रूप में उपयोगी है। अरावली पर्वत राजस्थान को पानी पिलाने और समृद्ध बनाने का काम करता है। इसलिए अरावली को बचाना और उसे वैसी की वैसी बनाए रखना बहुत जरूरी है।
अरावली को बचाने की लड़ाई तरुण भारत संघ के पिछले 1980 के संघर्ष से लेकर आज तक चली है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हमेशा अरावली को बचाने के लिए तरुण भारत संघ के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। उन्हीं निर्णयों के कारण आज हम अरावली को कुछ हद तक बचा हुआ देख सकते हैं। यदि वह लड़ाई उस वक्त शुरू नहीं होती, तो आज अरावली नहीं बचती और इस पूरे इलाके में जो थोड़ा-बहुत मीठा पानी मिल रहा है, वह भी नहीं मिलता। उस जगह भी खारा पानी मिलता।
इसलिए इस डेजर्ट यानी रेगिस्तान को अरावली पर्वत की जरूरत है,इसे नियंत्रित करने के लिए और लोगों को मीठा जल उपलब्ध कराने के लिए।
अरावली पर्वत माला राजस्थान के लगभग सभी जिलों में है और गुजरात के भी कुछ जिलों में फैली हुई है। हरियाणा के कुछ जिलों में और दिल्ली में भी अरावली का विस्तार है। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में भी इसका हिस्सा है। अरावली पर्वत की इस पूरी श्रृंखला को बचाना बहुत जरूरी है।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने इसे बचाने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई है, जो आजकल इस क्षेत्र का दौरा कर रही है। उसे भी यह समझना चाहिए कि यह अरावली पर्वत माला केवल खनिजों के लिए नहीं है। इसका एक बहुत गहरा महत्व है। इसी के कारण हमारी सबसे पुरानी विरासत आज अरावली पर्वत माला में बची हुई है। यदि हम अरावली पर्वत माला को नहीं बचाएंगे, तो हमारी विरासत भी नहीं बचेगी। इसलिए भारत की विरासत को बचाने के लिए अरावली पर्वत को जैसा है, वैसा ही, बिना खनन के बचाकर रखना होगा।
रेयर मटेरियल के नाम पर, रेयर अर्थ के नाम पर अरावली पर्वत को खोदने का जो षड्यंत्र है, उसे अरावली के लोग चलने नहीं देंगे। ये जो तत्व और खनिज हैं, वे दूसरे राज्यों में भी बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं। अरावली के बजाय उन्हें उन राज्यों से निकालना चाहिए। वे क्षेत्र उतने संवेदनशील नहीं हैं, जितना संवेदनशील अरावली का क्षेत्र है। इसलिए अरावली को बचाना सबसे ज्यादा जरूरी है।
जलपुरुष ने आगे कहा कि अरावली पर्वत माला और रेगिस्तान, इन दोनों का भाई-बहन जैसा रिश्ता है। जब भाई नाकामयाब हो जाएगा, तो बहन भी बेसहारा हो जाएगी। रेगिस्तान का अस्तित्व और उसका संतुलन अरावली पर्वत माला से जुड़ा हुआ है।
अरावली पर्वत ही हमारे देश को पश्चिम से आने वाली हवाओं की धूल-मिट्टी से बचाता है। अरावली पर्वत माला के कारण रेगिस्तान का विस्तार नियंत्रित रहता है। इसलिए अरावली को बचाना केवल एक पर्वत श्रृंखला को बचाना नहीं है, बल्कि पानी, पर्यावरण, विरासत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाना है।
कार्यक्रम में जल प्रबंधन अभियान समिति की घोषणा की गई। नर्मदा देवी सिंहानिया इंटरनेशनल स्कूल के 50 छात्रों ने जल और पर्यावरण संरक्षण की शपथ ली।
’समिति के सदस्य’
– ’संरक्षक’ डॉ. राजेंद्र सिंह
– ’मुख्य सलाहकार’ श्री अनिल सागर
– ’संयोजक’ डॉ. मनोज कुमार, अध्यक्ष, सिंहानिया विश्वविद्यालय और कैंपस निदेशक प्रो. (डॉ.) पी.एस. जस्सल यह समिति छात्रों के बीच जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, पौधारोपण और पर्यावरण जागरूकता से जुड़ी गतिविधियां करेगी और समाज में जल संरक्षण को लेकर जनजागरूकता फैलाने का काम करेगी।
कैंपस निदेशक प्रो. (डॉ.) पी.एस. जस्सल ने सभी अतिथियों, छात्रों, शिक्षकों और सहयोगी संस्थाओं का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. सुमित सिंह ने किया।
‘जल संचय जन अभियान’में तरुण भारत संघ, जल प्रहरी, डालमिया ट्रस्ट, समग्र विकास संस्थान, सहयोग संस्थान, स्थानीय ग्राम पंचायत, वाटर विजडम फाउंडेशन और अन्य सामाजिक व गैर-सरकारी संगठनों ने सक्रिय भागीदारी की। इससे इसे जन आंदोलन का रूप मिला।
विश्वविद्यालय और स्कूल के छात्र, शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और क्षेत्र के सम्मानित नागरिकों ने उत्साह के साथ भाग लिया और जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाने का सामूहिक संकल्प लिया।
इस मौके सिंहानिया विश्वविद्यालय के अध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार,विश्वविद्यालय के वर्तमान अध्यक्ष श्री रवि सिंघानिया, पचेरी के पूर्व सरपंच श्री ओम प्रकाश बोहरा, वॉर फॉर वॉटर से श्री निरंजन सिंह, डालमिया ट्रस्ट से श्री भूपिंदर पालीवाल, जल प्रहरी से श्री अनिल सागर और श्री दीप सिंह, श्री डी.पी. सैनी (सहयोग संस्थान) और अन्य गणमान्य लोग व स्कूली बच्चे शामिल हुए। सभी ने जल संरक्षण और जल स्रोतों के पुनरुद्धार की शपथ ली।





