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विश्व जल तीर्थ :- जल प्रयोगशाला भिकनपुरा राजस्थान डॉ राजेंद्र सिंह जलपुरुष 

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विश्व जल तीर्थ :- जल प्रयोगशाला

डॉ राजेंद्र सिंह जलपुरुष राजस्थान भारत

तरुण भारत संघ ने जब जल संरक्षण का काम शुरू किया था, उसी काल में तरुण भारत संघ परिसर में गायों को पानी पिलाने के लिए एक छोटा सा तालाब बनाया था। उस तालाब को गहरा करते-करते बहुत सारी आश्चर्यचकित करने वाली भू-बनावटों और भू-संरचनाओं का दर्शन हुआ। तरुण भारत संघ भी अपने जल प्रशिक्षण से जुड़े विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने के लिए धीरे-धीरे इस प्रयोगशाला में नए-नए खोज और नए-नए तरीके के काम करता रहा।

अब परिणाम यह है कि तरुण आश्रम, भीकमपुरा में तरुण भारत संघ के मित्रों, साथियों और शुभचिंतकों द्वारा तैयार की गई इस जल संरचना में भू-आकृति और भू-बनावट को समझने का बहुत ही सुंदर, परिमार्जित और प्राकृतिक स्वरूप दिखाई देता है। जहाँ कहीं अधिक पढ़े-लिखे लोग इन चीजों में विचलित हो जाते हैं कि कोई प्राकृतिक प्रयोगशाला कैसे हो सकती है, क्योंकि उनकी प्रयोगशालाएँ तो कृत्रिम ही होती हैं; लेकिन यह भूजल संरक्षण के लिए विश्व स्तर की अद्भुत प्रयोगशाला बन गई है, जहाँ दुनिया भर के राजनेता, अधिकारी और व्यापारी आकर प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं।

तरुण भारत संघ की यह प्रयोगशाला अभी तक दुनिया के मंत्रियों, अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों सभी को यह सिखाने में सफल हुई है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से होने वाले काम प्रकृति से इंसान को दूर ले जाते हैं, लेकिन लोकभाव विद्या और लोक-बुद्धिमत्ता से होने वाले काम इंसान को प्रकृति के साथ जोड़कर रखते हैं। जब इंसान प्रकृति के साथ जुड़कर अपने आप को देखता है, तब वह प्रकृति से सीखने के लिए रास्ते भी खोज लेता है।

यह प्रयोगशाला मेरे जीवन में 80 के दशक में काम की सीख के लिए शुरू हुई और मुझे धरती के अंदर की बनावट तथा धरती के ऊपर की प्राकृतिक वनस्पतियों से सीखने और सीख देने में सफल सिद्ध हुई। इस प्रयोगशाला में जब हम पूर्व दिशा की ओर मुँह करके खड़े होते हैं, तो बाईं तरफ उत्तर दिशा में केवल काँटेदार पेड़ दिखाई देते हैं, क्योंकि उस तरफ धरती में जो दरारें हैं, वे समतल दरारें हैं। दक्षिण दिशा में धरती के अंदर सीधी जाने वाली दरारें हैं। इसलिए जहाँ धरती के अंदर जाने वाली दरारें हैं, उस तरफ हरे-भरे, लंबे और पत्तियों वाले पेड़ हैं।

चालीस वर्षों में यह अनुभव और गहरा होता गया, क्योंकि हमारी आँखों के सामने ही इस प्रयोगशाला की प्राकृतिक निर्माण प्रक्रिया विकसित हुई। हमने देखा कि जिस तरफ पत्थर में दरारें नहीं हैं, या नीचे की तरफ जाने वाली दरारें नहीं हैं, उस तरफ कोई पेड़ नहीं होते। यदि होते भी हैं, तो काँटेदार होते हैं, पत्तियों वाले नहीं। और जिस तरफ धरती में दरारें नीचे तक जाती हैं, उस तरफ पत्तियों वाले, लंबे और हरे-भरे पेड़ होते हैं। यह अंतर दिन-ब-दिन और स्पष्ट होता गया तथा अनुभव बनकर अनूभूति को मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।

प्रकृति सबसे बड़ी गुरु है। प्रकृति से मिलने वाली विद्या जीवन को विखंडित नहीं करती, बल्कि जोड़ती है। जीवन को जोड़ने वाली यह विद्या प्राकृतिक लोकभाव विद्या में विद्यमान है। यह बात इस प्रयोगशाला की निर्माण प्रक्रिया में सिद्ध हुई।

इस प्रयोगशाला में सीखने के लिए आज भी कई युवा विदेशों से आते हैं, जिनमें से एक नाम डॉ. नितिन है। ऐसे ही प्रतिदिन लोग इस प्रयोगशाला में भ्रमण करते हैं। इस प्रयोगशाला में सीखने के लिए किसी प्रशिक्षक की आवश्यकता नहीं होती। जो स्वयं प्रकृति के साथ जुड़कर देखना और सीखना चाहते हैं, वे इस प्रयोगशाला में भ्रमण करके जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, वर्षा जल के वाष्पीकरण को रोकने तथा वर्षा जल से जल उपयोग दक्षता बढ़ाने की सहज सीख प्राप्त कर लेते हैं।

यह प्रयोगशाला एक ही स्थान पर दुनिया की विविध प्रकार की भू-आकृतियों और भू-संस्कृतियों को सिखाने में सक्षम है। इसमें विविध प्रकार की चट्टानें, मिट्टियाँ तथा चट्टानों के बीच की दरारों का दर्शन होता है। भूजल संरक्षण की आकृति, जिसे अंग्रेज़ी में *Aquifer* कहते हैं, वह भी इसमें स्वतः ही दिखाई दे जाती है।

इस प्रयोगशाला में एक साथ 500 व्यक्ति विभिन्न कोनों पर खड़े होकर सीख सकते हैं, देख सकते हैं, और एक व्यक्ति भी इसे स्वतंत्र रूप से देख-समझ सकता है। यह प्रयोग करके सीखने की सहज जगह है।

किस प्रकार की मिट्टी में कितना घनत्व होता है, किस मिट्टी में कितना जल सोखने की शक्ति होती हैयहाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टियों पर प्रयोग करके देखा और सिद्ध किया गया है। नए लोग भी यहाँ प्रयोग करके इसे देख और सिद्ध कर सकते हैं।

कौन-सी मिट्टी की कितनी क्षमता होती है? किस मिट्टी की जल-धारण क्षमता कितनी है? यह सब यहाँ अलग-अलग प्रकार की मिट्टियों में देखा और समझा जा सकता है।

इस प्रयोगशाला को हमने प्रारंभ में प्रयोगशाला की तरह नहीं, बल्कि प्रकृति की व्यवस्था से सीखने के लिए बनाया था। फिर यह धीरे-धीरे एक व्यापक वैश्विक प्रयोगशाला बनती गई।

तरुण भारत संघ का सदैव यह प्रयास रहा है कि वह जो भी काम करे, लोगों से सीखकर और लोगों के लिए जो उत्तम हो सकता है, वही विधि अपनाए। तरुण भारत संघ ने अरावली को बचाने और उसे पुनर्जीवित करने का जो भी कार्य किया, उसके पीछे इस वैश्विक जल प्रयोगशाला की सीख है। क्योंकि इस प्रयोगशाला में अरावली क्षेत्र की भू-आकृतियाँ, भू-बनावट और भू-संरचना को देखने और समझने का अवसर मिलता है।

इस प्रयोगशाला में राष्टपति भवन से लेकर, ठेठ गांव की ढ़ाडियों में रहने वाले लोगों को प्रशिक्षित किया है। राष्टपति के.एन. नारायण ने प्रयोगशाला में तैयार हुए काम को देखा था; इसलिए इस प्रयोगशाला की सीखने वालों में इरान, इथोपिया, अफ्रीका, सोमालिया, केन्या आदि देशों में जल संरक्षण के काम किए है। यह प्रयोगशाला सैंकडों देशों के लोगों को समय-समय पर प्रशिक्षित करती रही है, फिर उन लोगों ने अपने देश में पहुंचकर काम किया है।
इसलिए यह प्रयोगशाला अनुभवों की अनुभूति के आधार पर निर्मित हुई है। अनुभवों की अनुभूति से यह समझ विकसित हुई कि जल का रक्षण और संरक्षण करके, मिट्टी में नमी बढ़ाकर, हरियाली बढ़ाकर तथा हरियाली के माध्यम से वातावरण में O₂ का स्तर बढ़ाने के क्या परिणाम होते हैं। यह सब यहाँ सीखने और करने का एक अच्छा अवसर रहा है।

 

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गोदावरी शुक्राचार्य

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