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वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में पहला पॄथ्वी शिखर सम्मेलन शुरु हुआ था :- वॉटरमॅन राजेंद्र सिंग जी 

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कोप30 (#COP30), ब्राजील

वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में पहला पॄथ्वी शिखर सम्मेलन शुरु हुआ था :- वॉटरमॅन राजेंद्र सिंग जी 

3 नवम्बर 2025 को जलपुरुष राजेंद्र सिंह, अनंत विश्व विद्यालय के विद्यार्थियों के साथ तरुण आश्रम भीकमपुरा से नीमली पहुंचे। यहां विद्यार्थियों ने कोप 30 ब्राजील के बारे में पूछने पर Waterman Rajendra Singh जी ने बताया कि, वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में पहला पृथ्वी शिखर सम्मेलन (अर्थसम्मिट) शुरू हुआ था। हम तब विद्यार्थी थे और पर्यावरण शब्द इस स्टॉकहोम अर्थसम्मिट (पृथ्वी शिखर सम्मेलन) से निकला था। पहली बार पर्यावरण की चिंता हमने 1972 में उस सम्मेलन के समाचारों से सुनी थी। तब भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बहुत ही महत्वपूर्ण भाषण दिया था कि पर्यावरण, प्रकृति और गरीब इंसानों का गहरा संबंध है, कैसा रिश्ता है और पर्यावरण के दुष्प्रभावों का गरीबों के जीवन पर सबसे बड़ा बुरा असर पड़ता है। गरीबों की और पर्यावरण की एक साथ चिंता करने वाली वह पहली प्रधानमंत्री थी जो पर्यावरण की चिंता और गरीब दोनों की चिंता एक साथ कर रही थी। पर्यावरण और गरीबी की चिंता करना सरकारों की जिम्मेदारी है।
इन्होंने पर्यावरण की चिंता के लिए जंगल, जंगली जानवर संरक्षण के लिए बहुत अच्छे कानून बनवाए थे।
इसके पर्यावरण शब्द के विरुद्ध बड़ी’-बड़ी कम्पनी एकत्रित हुई और उन्होनें कहा कि, इससे हमारे उद्योग-धंधे सब बंद हो जायेंगे। कंपनियों ने अपनी आवाज 20 वर्षों में बहुत संगठित होकर बुलंद कर ली और 1992 में रियो डि जेनेरो, ब्राजील के दूसरे कोप में इनकी आवाज सुनी जाने लगी।
उन्होंने आगे बताया कि 1992 में रियो डि जेनेरो में हुए सम्मेलन में भाग लिया था। वहां उन्होंने देखा कि, समुदाय के सामुदायिक लीडर, कम्युनिटी लीडर कितनी बुलंदगी से अपनी प्रकृति की, जंगल की, पंचमहाभूतों की बात को रख रहे है।

1991 में पेरिस फ्रांस के राष्ट्रपति मित्राओ ने हमे बुलाया था। दस दिन तक यहां हमने छोटे छोटे फोरम पर अपनी आवाज रखी थी। यहां तरुण भारत संघ के अनुभवों को बहुत अच्छे से प्रस्तुत किया था। तब तरुण भारत संघ का काम अरावली और सरिस्का के जंगलों में बहुत जोरो से चल रहा था। यही समय था जब तरुण भारत संघ चार राज्यों में खनन बंद करवा चुका था। तब तरुण भारत संघ को पर्यावरण का बढ़ा योद्धा माना जाता था । यह आगे की कोप का तैयारी सम्मेलन था। इस सम्मलेन में दुनिया के बहुत सारे लोकनेता और पर्यावरण की आवाज को उठाने वाले कार्यकर्ताओं का बढ़ा दल गया था। इस दल में शेखर पाठक, ओम थानवी, आशीष कोठारी जैसे बहुत सारे पर्यावरण की चिंता करने वाले भारतीय लोग गए थे। मुझे आज भी याद है जब इस सम्मेलन से लौट रहे थे ,तभी Tarun Bharat Sangh को दूसरी जीत अरावली के खनन को बंद कराने की सफलता मिल गई थी।

दुनिया ने इस बार इसे समझौते के तरीके से समझने की कोशिश की। तब भारत के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव थे। उनका भाषण भी उतनी ही बुलंदगी से पूरी दुनिया के सामने आया था। उन्होंने कहा था कि, प्रकृति और पर्यावरण का सम्मान जब हमारा दिन शुरू होता है तब से करना शुरू करते हैं। हम भारतीय लोग “समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥“ श्लोक का स्मरण करके सम्मान करते है। हमारा देश प्रकृति और मानवता दोनों का बराबर सम्मान रखता है।
आगे जलपुरुष जी ने बताया कि, 10 वर्ष के बाद यही सम्मेलन कूपन हैंगन में आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन में क्लाइमेट चेंज, बायोडायवर्सिटी शब्द बहुत जोरों से उभरने लगे थे। उसके बाद वर्ष 2002, जोहंसवर्ग में कमला चौधरी और नेपाल के उज्जवल प्रधान के साथ पूरे 10 दिन रहने का अवसर मिला था। तब हम भारत से अर्थ चार्टर लेकर गए थे। उनमें समुदाय, व्यक्ति और संस्था के योगदान को निभाया था।
इस सम्मेलन लोग उद्योगो के विरुद्ध अपनी आवाज को जोरों से इस अर्थ सम्मिट में रख रहे थे। कमला चौधरी जी ने हमारे हमारी बात को अपने ढंग से बहुत बुलंदगी से रखा था। इसी समय मुझे यूएनडीपी के कई कार्यक्रम में भाषण देने का मौका मिला था, जिसमें मैंने तरुण भारत संघ के अनुभवों को बहुत अच्छे से प्रस्तुत किया था। तब तरुण भारत संघ यूएनडीपी के साथ जल संरक्षण द्वारा महिला सबलीकरण का अनोखी परियोजना चला रहे थे। यह अधिकतर चंबल क्षेत्र में चला था। यहां महिलाओं ने अपनी शक्ति और समझ के साथ वहां के हिंसक अर्थतंत्र को अहिंसक अर्थ तंत्र बनाया था। यह वही दौर था जब हम जोरो से गरीब महिलाओं के सबलीकरण से जल संरक्षण करके खेती के लिए तैयार कर रहे थे।

इस सम्मेलन के बाद अर्थसम्मिट का अर्थ और नाम बदलकर धीरे-धीरे “कोप“ हो गया था। मैं अधिकतर कोप सम्मेलन की बैठकों में गया हूं। इजिप्ट में आयोजित कोप28 में इस ब्राजील कोप प्रक्रिया के खिलाफ की आवाज उठाना दुनिया के आदिज्ञान वाली समुदाय ने उठाना शुरू किया था। कहा था कि, इन सम्मेलनों में आदि ज्ञान को समझने और सम्मान करने की प्रक्रिया नहीं है।
जलपुरुष जी ने बताया कि हम दुनिया के लगभग 200 आदिवासियों का समूह था,जिसने आवाज उठाई थी। तभी साईनाई पर्वत के नीचे वहां की महिला मोना के साथ मिलकर वहां के स्थानीय लोगों को नदी पुनर्जीवन के बारे में सिखाया और शुरू किया था। इसके बाद इस काम को मोना ने आगे बढ़ाया है।
यह कोप पर्यावरण का दिखावा है। यह काम तो बड़े उद्योगों के लिए कर रहा है। उद्योगपति और सारी लोकतांत्रिक सरकारें मिल गई है और यह दोनों मिलकर जनता को भ्रमित करके अपना खेल, खेल रहे हैं। इसलिए कोप प्रक्रिया ठीक नहीं है बल्कि जो इंडीजीनस नॉलेज प्रक्रिया है, वह ज्यादा कारगर है, उसी को हमें पर्यावरण और लोगों के लिए संवेदनशील बनाकर, अपनाने की जरूरत है। उसके बाद दुबई और अब ब्राजील जा रहे है। इसके बाद यात्रा दिल्ली से ब्राजील के लिए रवाना हुई।
4 नवंबर को यात्रा वैले, ब्राजील पहुंची। यहां पर्यावरण मंत्री मीरा सिल्वा के कारण जलपुरुष जी को अपनी बातें रखने का मौका मिला है। जलपुरुष जी ने बताया कि, अब कोप की राजधानी ब्राज़ील नहीं बल्कि वैले हो गया है। कोप के लिए यह वैले शहर बनाया गया है। इसमें भी बहुत सारे पेट कटे हैं,जिससे बहुत नुकसान हुआ है जंगल का। इसी तरह दुनिया का सबसे बड़ा फॉरेस्ट अमेजन था। जहां की नदियों का नाम बड़े उत्साह से लिया जाता था। अभी जंगल के बीचों बीच गहरे जंगलों में नए होटल , नए छोटे-छोटे शहर बन रहे हैं और जंगल घटता जा रहा है। जंगल पर सबसे ज्यादा अतिक्रमण, यहां पर इस वक्त यहां रहने वाले लोगों का जीवन चक्र बदल गया।
आगे जलपुरुष जी ने बताया कि, 5 नवंबर को बहुत सारे शहरो को देखा। वैला एयरपोर्ट से उतर का हम जंगल के बीचों बीच 100 किलोमीटर गाड़ी से चलकर एक होटल में ठहरे और इस होटल में एक नंबर कमरा, होटल का जो सबसे ऊपर का कमरा था वह मुझे दिया गया था। हा बहुत सुंदर जगह है बहुत साफ सुथरी हवा बड़े आनंद का स्थान है। यहां पर शाम को सहयोग में सैजो ने दुनिया के कुछ पर्यावरण कार्यकर्ता बुलाए थे, उनके साथ बैठक हुई।
6 नवंबर को सुबह 6 बजे अनामीदेवा शहर की म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के बड़े सिटी हॉल में पहुंचे। यहां पर दुनिया भर के पर्यावरण कार्यकर्ता मौजूद रहे। यहां बैठक में हमने पर्यावरण और लोगों की बात इस कोप में जैसे जोरों से रखे , इस रणनीति पर बातचीत हुई। इस बैठक में कम्युनी द पाज़ , जंगल, पानी, समाज को कैसे आगे रखा जाए, जंगल को कैसे बचाया जाए इस पर लंबी बातचीत हुई। यहां एक बात और उभर कर आई कि जो सरकारें अपने आपको लोकतांत्रिक कहती है लेकिन वो है नहीं। वो उद्योगपतियों के इशारे पर काम कर रही है । इस वक्त उद्योगपतियों, सरकारों और सत्ता का त्रिगुट बन गया है जो पर्यावरण, आदिवासी लोगों के विरुद्ध है।
इस तैयारी सम्मेलन में मैने बीज विचार को प्रस्तुत किया। कहा कि, हमें अब भोगी विकास का विकल्प प्रकृति और संस्कृति दोनों के रिश्तों को समझकर गहराई से जोड़कर विनाशकारी विकास का लालच दिखाने वाले त्रिगूट के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनी होंगी। यह काम केवल आवाज बुलंद करने से नहीं होते है, यह काम तरुण भारत संघ की तरह सतत 50 वर्षो जैसे करने से होते है। जैसा तरुण भारत संघ के कामों का प्रभाव छोटे छोटे गांवों में हुआ। कोप, 2015 पेरिस में तरुण भारत संघ की बात “जलवायु ही जल है – जल से जलवायु है“। जलवायु परिवर्तन को रोकने के जलवायु अनुकूलन, उन्मूलन के काम जिस तरह से सतत तरुण भारत संघ ने किए,उसके कारण ही “जलवायु ही जल है“ को पेरिस के कोप21, वर्ष 2015 में सम्मेलन को दो दिन आगे बढ़वाकर मनवा सके थे। इसलिए हमे एक तरफ पर्यावरण, प्रकृति और लोगो की बात को जोरो से रखना। दूसरी तरफ तरुण भारत संघ की तरह प्रत्यक्ष काम करके दिखाना है। जैसे हिंसा को रोकर अहिंसा का वातावरण बन सके। यह काम तरुण भारत संघ ने करके दिखाया है। इस तरह प्रकृति के अनुकूल, उन्मूलन व रचना के काम करना और प्रकृति का विनाश करने वाले विकास के विरुद्ध सत्याग्रह का बुलंदगी से लोगो को समझाकर तैयार करके रुकवाना है। तभी प्रकृति को मजबूती मिलेगी। यह हमारी आर्थिकी और परिस्थिति दोनों को समृद्ध करती है। हमें यदि अपना अच्छा वर्तमान और भविष्य ठीक करना है तो हमें इसी तरह के काम करने के लिए आगे बढ़ना होगा। यह काम हमारे लिए ग्रीन जॉब करता है। यहां प्रकृति को प्यार, सम्मान , विश्वास पैदा कराकर, लोगों के मन में तभासं ने प्रकृति की आस्था जगाने का काम किया है। पूरी दुनिया में हमें ऐसा काम करना होगा तभी कोप जैसी दुनिया की सबसे बड़ी पर्यावरण की रक्षा के नाम पर होने वाले सम्मेलन में अपनी बात को मनवा सकेंगे। जिस तरह भारत में प्रकृति के पुनर्जनन का मॉडल तरुण भारत संघ ने प्रस्तुत किया है। वो जलवायु परिवर्तन अनुकूलन उन्मूलन का पिछले 50 वर्षो का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। वैसा काम पूरी दुनिया में करने की जरूरत है।
जलपुरुष जी ने अपने भाषण में कहा कि अरावली के खनन को रुकवाने का काम 1980- 90 के दशक में वहां के लोगो को तैयार करके हुआ, उसने 7 मई 1992 को दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान की अरावली पर्वतमाला में एक बड़ी शांतिमय क्रांति को जन्म दिया था। वैसा शांतिमय क्रांति ही हमारी आवाज को कोप में सफलता दिला सकती है। इसलिए एक तरफ में रचना के काम करने होंगे और दूसरी तरफ प्रकृति के विरुद्ध वाले लोगों से सत्याग्रह करके रोकना होगा। यह काम लोक संगठन से ही संभव है। जगह लोक संगठन बनाकर पूरी दुनिया में अर्थसत्ता के दुष्चक्र को रोकने में सफलता पा सकेंगे।
जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि, ब्राजील के अमेजॉन जंगल को बचाने के लिए इसी तरह के कानून बनाना चाहिए। इस कोप में ऐसे ही कानून को बनवाने को मांग ब्राजील के लोगों को करना चाहिए। भारत में नदी पुनर्जीवन के अनेक छोटे छोटे काम हुए हैं। तरुण भारत संघ ने 50 वर्षो में 23 छोटी नदियों को पुनर्जीवित किया है। इसी तरह के प्रकृति और मानवता के पोषण का काम की पूरी दुनिया में होना चाहिए। प्रकृति के पोषण के काम करते हैं तो हमेशा ग्रीनजॉन बनती हैं । तरूण भारत संघ छोटा सा संगठन है, लाखों लोगों को जो पहले गांव छोड़कर शहर जाते थे अब शहर के लोग वापस गांव में आकर खेती करने लगे हैं क्योंकि उनकी खेती में पानी मिल गया है तो यहां से शोषण, पलायन, अतिक्रमण रुक गया। अब यहां प्रकृति के पोषण का काम आगे बढ़ा है। यहां मौजूद एरो वैलो, डेनियल ने भी इन्ही बातों का समर्थन किया।

7 नवंबर को यहां के मेयर डेनियल सैंटोस, डिप्टी सीनेटर, आंदोलन कर्ता जेसिका बार्वेज ने कहा कि, ब्राजील में गलत कामों को रुकवाने के लिए हम आंदोलन कर रहे हैं। मेरी आवाज भी सुनी जा रही है। यहां की मंत्री मासा लोपियास ने कहा कि लूला सरकार प्रकृति और पर्यावरण का बहुत काम कर रही है। हमें अमेजॉन को बचाने के लिए पूरी सरकार काम कर रही है।
इस अवसर पर जलपुरुष जी ने कहा कि, यह बात ठीक है इस वक्त लूला सरकार पर्यावरण के लिए चिंतित है लेकिन यह जो विकास की धारा जिस तरफ चल रही है इसमें प्रकृति और संस्कृति का सहयोग नहीं है, योग नहीं है, इसमें बहुत दूरियां बढ़ रही हैं। इसलिए यहां नदियां आधुनिक खेती से प्रदूषित हो रही हैं और बहुत भयानक बीमारियां आ रही हैं।
उन्होंने कहा कि, यहां की सरकार को भारत से सीख मिल सकती है। भारत में मल्टी नेशनल कंपनी के कानून में आम व्यक्ति अपने बीज की मूल आत्मा को बचाने के लिए काम करता है। ब्राजील का कंपनी तंत्र ब्राजील को बहुत बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। ब्राजील की कंपनियों ने बीज के मूल अधिकार को लोगों से छीन लिया है। भारत में अभी ऐसा नहीं है। भारत के लोगों को अभी बीज मूल को बचाने का अधिकार लोगों को है।
ब्राजील सरकार को ऐसे कानून को ध्यान में रखकर दक्षिण-दक्षिण के सहयोग को बढ़ाकर हमारी मूल जैव विविधता के काम करने की आवाज उठानी चाहिए। अंत में जलपुरुष जी ने कहा कि, अभी वक्त है कि हम कोप के अवसर पर प्रकृति और संस्कृति को बचाने की आवाज बुलंद कर सकें। कोप के निर्णय प्रकृति और संस्कृति को योग को ठीक करके, सभी राष्ट्रों को अपने भू सांस्कृतिक मानचित्र तैयार करके, डिजाइन के अनुरूप शिक्षा को विद्या के रूप में बदलकर आगे बढ़ना होगा।
अंत में जलपुरुष ने कहा कि, हम जिन राजनेताओं को चुनकर, अपने भविष्य को सुरक्षित और सुंदर बनाने की जानकारी देते है वो आज उद्योगपतियों के साथ मिल चुके है। जिसके कारण हमारी प्रकृति और संस्कृति का विनाश बहुत तेज गति से हो रहा है। हमें यदि दुनिया की प्रकृति और संस्कृति को बचाना है तो अपने राजनेताओं को उद्योगपतियों के हाथों में खेल खेलने से रोकना होगा। जिससे हमारी प्रकृति और संस्कृति की रक्षा होगी। कोप का भी लक्ष्य प्रकृति और संस्कृति की रक्षा करना ही है;इसलिए हम मिलकर प्रकृति व संस्कृति को बचाने का काम करें; तभी विनोबा भावे का नारा ‘जय जगत’ सफल होगा।

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गोदावरी शुक्राचार्य

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